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धीमी आंच पर "मैं"

       तुमने छोटे-छोटे मिटटी के बर्तन देखे हैं! वो बर्तन जिनमें कल्पनाएं पकती हैं! उन्हीं बर्तनों में "मैं" का पकना भी आरंभ हो जाता है। विरोध तब स्वयं को प्रकट करता है, जब ये "मैं" बर्तनों का आकार बढ़ने के बाद भी, बर्तनों में समा नहीं पाता, बाहर छलकने लगता है, विस्तार पाने लगता है।         विडंबना ही है कि हर "तुम" को लगता है, वो "मैं" को उससे बेहतर जनता है। यह "तुम" के द्वारा "मैं" का व्यक्तित्व निर्धारण कैसे संभव है! मेरे भीतर जितना भी "मैं" था उसे तो मैं अपने ही पैरों से कुचलती आई हूं, अब जो है वो तो सिर्फ एक ज़िद है, जो हार नहीं सकती, क्योंकि जीने के क्रम में उसने खिलौने के बर्तन में पकने वाली, प्रेम-कविताओं पर सिकने वाली, पुराने गानों में घुलने वाली कितनी ही कल्पनाओं की हत्या की है। अब उसके पास हरने का विकल्प नहीं रहा।  अपने "मैं" को उसने स्वयं ही दो हिस्से में फाड़ दिया है और उसके ही दोनों हिस्से जाहिल कुत्तों से एक दूसरे को नोचते रहते हैं।         अपनी ही प्रकृति से आखिरी क्षण तक लड़ते हुए जीना और अपने ...

राधिकाराधितम् ...

       बहुत आगे-पीछे विचार कर उसने ठिठकते शब्दों से कहा, "एगो धागा गले में डाल लीजिए, सुहागिन का गला सूना, हाथ खाली, ठीक नहीं लगता है", मैं इन प्रश्नों की आदि... मुस्कुरा उठी। अनायास ही मेरे मुंह से निकला...  "जो सब श्रृंगार करती हैं, उनका सब ठीक चलता है?" वो कुछ नहीं बोली, आंखें उदास हो गई, हाथ चलते रहे। कुछ देर ठहर कर उसने कहा... "ठीकै बोल रही हैं, हई सब तो भुलाने के लिए है। हमार त बैलगाड़ी भगवान एकै पहिया क दिए, हमको अकेले खींचना है। "        मेरे सामने जाने कितनी एक पहिए की बैलगाड़ियां घूम गईं। दूसरा पहिया कहीं अवसाद में दिखा तो कहीं उन्माद में, कहीं हीनता में दिखा तो कहीं ठसक में, कहीं अज्ञानता में दिखा तो कहीं पूर्ण ज्ञान से युक्त। लाख देखने सोचने पर भी ठीक वैसा साथ नहीं दिखा दो पहियों में जैसे कि अपेक्षा सरल सुंदर कल्पनाओं में होती है। चलो साथ न सही, तालमेल ही सही, उचित सामंजस्य ही सही। इतना दुर्लभ क्यों हो गया 'प्रेम' के ठीक अर्थ में प्रेम देना, 'साथ' के ठीक अर्थ में साथ देना, उत्तर-प्रत्युत्तर के दुष्चक्र से मुक्त ...

अब मैं नास्तिक नहीं, वो पहले की बात थी।

           अब मैं नास्तिक नहीं, वो तो पहले की बात थी, जब मुझे पता था दो और दो चार होते हैं, गेंद ऊपर से नीचे गिरती है, बरसात के बाद ठंड आती है, जीवन और मृत्यु जैविक प्रक्रिया है, और तुम्हारा मिलना दुनिया की सबसे सुंदर घटना होगी।         अब मुझे पता नहीं..बरसात के बाद क्या होना है... अब गेंद हवा में कुछ देर टंगी भी रहे तो क्या, दो और दो कुछ होते भी हैं या नहीं! इस वृहत् शून्य में शब्द का निनाद, रस, गंध, रूप, स्पर्श... जीवन ही तो फूट पड़ता है शून्य से। मृत्यु है ही कहां ! और तुम .... सचमुच मिल गए हो क्या !!       अब जहां देखूं चमत्कार ही नजर आता है। एक क्षण के बाद दूसरे क्षण का घटना एक चमत्कार ही तो है। बारीक से अदृश्य धागे पर नट का सा संतुलन बनाए संसार का घटते रहना, बार बार ... लगातार.. आश्चर्य ही तो है! जीवन, तिस पर मेरा जीवन, मेरे जीवन में तुम... कैसा दुर्लभ संयोग ! इस संयोग पर मेरा अधिकार कितना क्षीण, मेरा अहंकार कितना विशाल ! इस अहंकार का टूटना कितना अनिवार्य है तुम तक पहुंचने के लिए!      ...

सब प्लास्टिक में तब्दील हो गया...

 एक कदम पीछे, फिर और एक, फिर और एक, जिंदगी के थपेड़ों से सहम कर, एक एक कदम पीछे लेती जा रही हूं। हर बार जब एक कांच का बर्तन फूटा, मैंने प्लास्टिक से बदल दिया। कुछ सालों के फेर में सब प्लास्टिक में तब्दील हो गया। जो सबसे ज्यादा नापसंद था, वही रोजमर्रा का जीवन बनता जा रहा है। अब भीतर बाहर सब प्लास्टिक है। न कुछ फूटता है, न कोई खनक है। अब कुछ नहीं बदलता। सालों साल की उदासीनता अपने में समेटे किफायती जीवन चल रहा है।         खीझ में उठाकर पटक भी दूं, तो होता कुछ नहीं, वही खीझ फिर उठा कर दीवार पर सजाने के अलावा विकल्प क्या है !            ये हटा दो न प्लास्टिक सब, मुझे वही कांच दे दो, या संभाल लूंगी या फूट जाऊंगी, मगर प्लास्टिक के साथ नहीं जी पाऊंगी। ये मैं नहीं हूं, मुझे इसमें घुटन होती है।          

एक और जन्मदिन...

      उम्र सीढियां उतरने लगी है, उसी घाट की ओर जहां चढ़ना उतरना लगा रहता है। अब घाट किनारे लोग कम हैं, भीड़ ज्यादा है। वहां गंगा नदी है जहां पहले गंगाजी होती थीं। महक तो है, खुशबू मगर चुप हो गई है। दिए अब ज्यादा जलते हैं, दिखाई कुछ नहीं पड़ता। वहीं से थोड़ा आगे कुछ नहीं है।         मगर इस घाट से उस कुछ नहीं तक ये जो छोटी सी दूरी है, ज़रा घटती नहीं है। वही एक लंबी डुबकी मैं आधे मन से ले रही हूं, वही उद्दाम सीढ़ी मैं फिर से चढ़ रही हूं।  

वक्त का दरवाज़ा.. खोल सकते हो??

 एक वक्त के बाद, सपने मुश्किल से ही आते हैं आंखों में। नींद का रास्ता देखती आंखों में, बार-बार पलट कर आता रहता है वो वक्त जो गुजर सकता था, अगर सब वैसा ही होता, जैसा होना चाहिए था... मगर जो हुआ नहीं, जो कहा नहीं, जो किया नहीं, जो घटा नहीं...        और जो घट रहा है... वो किसी बही खाते में दर्ज हो रहा है, जिसका हिसाब होगा किसी दिन, जब वो गुजर जाएगा वक्त के दरवाजे की चौखट लांघ कर।       क्या तुम खोल सकते हो वक्त का दरवाजा?? 

मैंने नाम भी उतार दिया...

       वहां कोई मंदिर नहीं था। मेरे अहंकार से बहुत ऊंचे पेड़ थे, जिनपर अनगिनत पक्षी वृन्द का बसेरा था, उनकी बहुत सारी बातें थी और थी बहुत गहरी चुप। इस पाती से उस पाती कुछ समझाते हुए बड़े आवेश से जातीं, फिर सामने बैठकर जैसे पूछती हों, कि मेरे पल्ले कितना पड़ा! मैं उनकी जोर से धड़कती हुई नन्ही काया की ओर देखती, उन्हें सांस लेने को समय नहीं था, उन्हें कुछ पता था जो मुझे बताना चाहती थीं। वो मुझे और गहरे लेकर गईं और वहां से एकाएक इशारा किया सड़क के दूसरी ओर बिछे पहाड़ों की ओर, मैं अपना बौनापन लिए वहीं पत्थरों पर रुक गई। एक दूसरी चिड़िया मेरे ठीक बगल से ऊपर को भागी, और काले बादलों में खो गई। बिजली एक बार पूरे जोर से कड़की, आंखें अपने आप ही बरसने लगीं। मैं चप्पल उतार कर आगे बढ़ी, तुम नहीं मिले। मैंने नाम भी उतार दिया। दर्द जो पालती आई थी, वो भी एक ओर रख दिए, उम्मीद छोड़ दी, मुझे कुछ हलचल सी महसूस हुई। यूं लगा तुम वहीं किसी ओट से मुझे देख तो रहे हो, सामने नहीं आते।मैं कुछ देर रुकी, फिर ज़िद भी उतार कर वहीं आंखें बंद किए बैठ गई। देर तक तुम्हें खुद को देखते महसूस करती रही। सचम...