नानी

     नहीं, मैं अब कुछ खास नहीं लिखती। जो अब मुझे विचलित करती हैं वो बातें मामूली हैं, वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनका कोई नैतिक, सामाजिक या वैचारिक सरोकार नहीं, वो मामूली हैं सड़कों के गड्ढों जितनी, उन गड्ढों में गवाई जाने वाली ज़िंदगियों जितनी। हमारे देश की रोजमर्रा की साधारण बातें, जैसे माँ को मेले की भीड़ में छोड़ आना, जैसे  किसी बच्चे को पानी की जगह तेज़ाब पिला दिया जाना, जैसे दूध हवा पानी अनाज सबमें जहर का होना... इनके बारे में क्या लिखना! 

       कल ही लिखने लगी थी एक पुरानी नदी के बारे में, जिसमें हरी-हरी काई, पत्थर, गोबर, और माँ सबकी खुशबू गुंथी हुई थी, जैसे धागे में मोगरे के फूल पिरोए हों, चौकी के बगल में रखी एक पानी से भरी कटोरी के बारे में, जिसमें दांत रखे होते थे, भीषण गर्मी के दिनों में गहरी नींद में भी अनवरत बेना डोलाने को चलते रहने वाले हाथों के बारे में, एक रुपए में भर दोना मक्खन बेचने एक खूब बूढ़ा फेरी वाला आता था उसके बारे में, फालसे को मथकर शरबत बनाती हथेलियों के बारे में, आइसक्रीम की चर्चा मात्र से चमक उठने वाली बूढ़ी पोपली आँखो के बारे में! 

      लेकिन कुछ नहीं लिखा मैंने। क्या लिखती! कि गंगा अब न नदी रही न माँ?, कि वो फेरी वाला अब कभी नहीं आएगा? कि अनवरत बेना डोलाने वाले हाथ अब रुक गए! 


         

           


     

Comments

  1. बोलती कुछ नहीं मगर बहुत सारा दर्द पी रही है नदी।😭

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

मुट्ठी में कुहासे को भींचने का यत्न !

आओ... सत्य प्रतीत होने वाली बातें करें