बीता हुआ एक दिन...
सुबह उठी, उठना नहीं चाहती थी, लेकिन अलार्म ने सोने नहीं दिया। आधी नींद में ही मैंने ट्रेन ट्रैकिंग ऐप पर अपनी ट्रेन का समय देखा, राइट टाइम थी। आधी खुली आँखों से सीधा रसोई की ओर मुड़ी, कुकर हाथ में लिया, लेकिन फिर रख दिया। खिचड़ी बनाने से पहले दाल चावल धोना होगा। मैने बर्तन में मूंग की दाल और चावल भिगो का रख दिए। मुझे बाथरूम जाना था, लेकिन मेरा शरीर मेरे कहने पर काम नहीं कर रहा था, किसी अवचेतन अनुबंध के प्रभाव में काम कर रहा था। मैने प्याज काटे, आलू छीला, खिचड़ी रख कर सीटी लगाने के बाद बाथरूम गई। बेटे को उठाया, लेकिन वो बार-बार सो जा रहा था। मैंने अम्मा को देखा, वो उठ चुकी थीं। लंगड़ाते हुए वो मेरे पीछे पीछे चलने लगीं। जो मुझसे छूटता गया, वे मुझे पकड़ाती गयीं।
गाड़ी आ चुकी थी, खिचड़ी रख ली गई थी, दही आ चुकी थी, बेटा उठ गया था, पापा सूटकेस गाड़ी में रख रहे थे, मैं भावशून्य मशीन की तरह करती जा रही थी जो जो करना था। तब तक बहन ने मीठी नीम की पत्तियां (करी पत्ता) हाथ में थमा दीं। अम्मा ने तोड़ कर दिया होगा.... लंगड़ाते हुए नीचे उतरी होंगी.... मीठी नीम की महक ने रोक दिया। भीतर कुछ भीगने लगा। ये पौधा मुझे प्रिय है, इस घर की अव्यवस्था मेरी अपनी है, ये मौवैज्ञानिक जटिलताएं मेरा हिस्सा हैं, जो यहां से चलते हुए हर बार थोड़ा छूट जाता है। अम्मा के हाथ का स्पर्श भी हर बार कुछ बदला हुआ, कुछ क्षीण होता जाता है।
लेकिन मुझे छपरा जाना था, वहां नौकरी है, पति है, बच्चे का स्कूल है, दो शुष्क कमरे हैं जिन्हें इन लंबे सालों की कवायद के बाद भी घर नहीं बना पा रही हूं, शायद क्योंकि वहां बाकी सब कुछ है, मैं ही नहीं हूँ।
ट्रेन का समय हो गया। पांच घंटे का सफ़र था। एक वृद्ध महिला मेरे सामने की सीट पर अकेले यात्रा कर रही थीं। उन्हें तेज़ बुखार था, खांसी थी। मेरे मन में सहानुभूति नहीं आई, भय आया... जाने कैसा वायरस होगा, बेटे को न हो जाए, मुझे न हो जाए... वे खांसते हुए मुंह पर हाथ भी नहीं रख रही थीं। मुझे अब क्रोध आने लगा। कुछ क्षण के लिए मैं खुद को सभ्य समझने लगी। मैने मास्क पहन लिया, बेटे को भी पहना दिया। जिस ओर उनका सर था, उसकी विपरीत दिशा में सर करके उनकी ओर पीठ किए मैं लेट गयी।
उनके कष्ट से कराहने और गहरी साँस के साथ "हे भगवान" की आवाज मुझ तक पहुंच रही थी, उसे मैंने कठोरता से अनसुना कर दिया। कुछ समय बाद ट्रेन में सब कुछ धुंधला हो गया, सिर्फ उनका "हे भगवान" का स्वर रह गया। मैं बेटे को खिचड़ी खिलाने उठी तो देखा, वे हथेली का मुक्का बनाए अपने सर को ठोक रही थीं। मैने अनायास ही पूछ लिया --
" क्या आपका सर दर्द हो रहा है?"
वे कहने लगीं -- हाँ, बहुत बुखार भी है। सफ़र में दवा रखनी चाहिए, बहुत गलती हो गई। आपके पास दवा है?
मेरे पास दवा नहीं थी। मैं मानवता ढूंढ रही थी। मैं। कब भीतर बाहर से इतनी खोखली हो गई।
उनसे सवाल पूछने के कारण वे उठकर बैठ गईं और मेरे ठीक सामने बैठकर खांसने लगी। मैने खाना वापस रख दिया। वे बलिया में उतर गईं।
छपरा में तेज़ धूप थी। मैने घर आकर चाय पी, खाना खाया फिर कार्य संबंधी एक मीटिंग ज्वाइन करके सुनने लगी। आदर्शवादी बातों, हवाई योजनाओं और वास्तविक समस्याओं में क्या कभी कोई तालमेल बैठ पाएगा ! वे शिक्षा की स्थिति सुधारने हेतु और अधिक सम्मेलनों पर जोर दे रहे हैं, किंतु क्या बंद कमरों में मुट्ठी भर लोगों के सालों साल वही बातें दोहराते जाने से सचमुच कुछ बदल सकता है?
खैर, मीटिंग समाप्त होने तक बेटा मुझे पुकारते - पुकारते ऊब कर सो चुका था। मैं उसके बगल में लेट कर उसके बाल सहलाने लगी। लेकिन वह ये अनुभव नहीं कर पा रहा था। वह इस एहसास के साथ सोया की माँ को मेरी परवाह नहीं। जब तक वो उठेगा मैं रात के खाने की तैयारी में रहूंगी, मुझे उसे पढ़ाने के लिए डांटना होगा, और इसी तरह एक दिन बीत जाएगा।
इसी तरह सब कुछ बीत जाएगा।
Time will pass away
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