Posts

मैं वो नहीं हूं जो तुम्हें नजर आती हूं!

 कुछ ऐसे क्षण होते हैं, जिनमें चेतना बाहर को नहीं, भीतर को झांकती है, चेतना में गुंथा ऐसा क्षण जहां से आपको याद रह जाता है, कि वो, वहां से मैं ,"मैं" हो गया था। वो आपके एक व्यक्ति के रूप में अस्तित्व में आने का क्षण होता है। हर किसी का वो "मैं" उस सांचे से अलग होता है, जो बाहर से हर "तुम " को नजर आ रहा होता है। ये कोई बड़ी अनोखी बात नहीं है... कि तुम वो नहीं हो जो मुझे नजर आते हो... कि मैं वो नहीं हूं जो तुम्हें नजर आती हूं।        मेरी चेतना मुझे हाथ पकड़ कर जहां ले जाती है, मेरे अस्तित्व का, मेरे मैं होने का जहां संज्ञान है... वो बड़ी अज़ीज़ खुशबू है, गंगा की, पुराने बड़े पत्थरों पर हरी काई की, सेकेंड हैंड किताबों के पुराने पन्नों की, लाइब्रेरी की मुहर की, सूती धोती में सींझे हुए पसीने की, ढिबरी में जलते पतंगे की, बनारसी पान की, स्याही वाली कलम और उसकी स्याही में भीगे उंगली के पोरों की, पसीने में घुले आंसुओं की, और बहुत सारी ऐसी बातों की जिनका तुमसे या तुम्हारी दुनिया से कोई संबंध नहीं हो सकता।         मैं वो हर क्षण हूं जो मैंने जिया,...

जो थोड़ी भीग जाती है...

  वो जो नीचे की रोटी है जो थोड़ी भीग जाती है जिसे कोई नहीं खाता वो रोटी मां खाती है।                      कल्पना में आ ही नहीं पाया वो ठौर जहां सर टिका कर सारे आंसू उड़ेल देने थे। खूब थक जाने बाद जिधर को देखना था.. कि उठो...  बस हिम्मत करके वहां तक पहुंच जाओ .. फिर सब ठीक हो जाएगा... वो जगह नहीं रही , जब जीवन के समीकरण से मां को हटा कर सोचना चाहा.. जीवन ही नज़र नहीं आया। वो जो उन्माद और खुमारी थी.. जिसमें ज़रा अकड़ कर उसकी भावनाओं को लतेड़ दिया था, वो खुमारी थी... सो उतर गई... अकड़ कंठ के कुछ और भीतर एक गांठ में बदलती चली गई...       मैं छत के दूसरे छोर से मां को धूप में बैठ कर बथुआ ( साग) चुनते देख रही थी। भवें सिकोड़ कर साग के लच्छे को आंखो के बिल्कुल पास ला कर ध्यान काफ़ी देर तक देखतीं... कुछ रखतीं, कुछ हटातीं.. हटाए हुए में से फिर कुछ रख लेती... फिर जाने क्या सोच कर उसे वापस फेंक देतीं। उनका चश्मा नीचे रह गया था, उनके मांगने के बावजूद न मैं ला कर दे पाई, न बहन, और भाई को तो साग बनाना ही व्यर्थ का उपक्रम ...

दस बरस अतीत हो गए...

 मैं सुस्त कदमों से चलती जा रही थी, बगैर सामने देखे। सड़क पर पेड़ों की पत्तियों से बच बचाकर जो धूप फिसल आई थी, वो तरह तरह की आकृतियां बना रही थी, मेरा ध्यान उन्ही पर था। मेरा कॉलेज बैग दोनो कंधो पर असहज सा खिंचाव बना रहा था, जिसे मैं नजरंदाज कर रही थी। मुझे लाइब्रेरी पहुंचना था, अगर आज भी घर चली गई तो ये बुक रिटर्न करना रह जाएगा। बुक इश्यू कराने और रिटर्न करने के बीच वो जो बुक पढ़ने वाला चरण होता है, वो मुश्किल से ही आता था मेरी दिनचर्या में। सारा वक्त बहसें निगल जाती! क्या नहीं हुआ और क्या नहीं होना चाहिए की बहसें !! वाहियात बहसें !! अतीत की सड़न को कुरेदती बहसें!! ... ओह! ये तो दस बरस पहले की घुटन है, अब कहां है कॉलेज! अब कहां है लाइब्रेरी! अब तो इश्यू और रिटर्न की खानापूर्ति भी गई। ये दस बरस भी तो अब अतीत हो गए। पाले के उस ओर से मुझे देख रहे हैं, जैसे किसी जाने-पहचाने अजनबी को देखा जाता है।  हथेली से होकर ये... यही जो अब घटने को है... गुजरने वाला है.. इसे ही खूब जी लूंगी। लो गया ये भी!! 

खरगोश जाना पहचाना सा लगा...

 तुम्हें वो कहानी याद है ! खरगोश और कछुए की कहानी... जिसमें कछुआ दौड़ जीत गया था.. तब कछुए की जीत कैसा रोमांच पैदा करती थी, उसका जज़्बा हिम्मत बांधने वाला था, उसका आत्म-विश्वास मुग्ध करता था... कैसे एक कछुआ खरगोश को दौड़ की चुनौती दे सकता है भला... सोचो तो .. कितना स्वाभिमान, कितना धैर्य.. और आखिरकार जीत। अदभुत !         तुम्हें कभी ऐसा लगा ! कि अगर कहानी में खरगोश जीत जाता तो उस कहानी का क्या बनता ?  मुझे लगा ...       खरगोश का जीतना कहानी नहीं बनती। क्योंकि खरगोश की जीत तो स्वाभाविक थी। एक प्राकृतिक तथ्य। तो फिर कछुए ने किस बूते खरगोश को चुनौती दी होगी ! मेरी दिनचर्या की हड़बड़ाहट को पीछे धकेल इस विचार ने मुझे घेर लिया। मैं ठहर गई। गूगल पर तफरी की तो पाया, इस कहानी के अलग-अलग रूप मजूद हैं। कहीं कछुए ने आगे बढ़कर चुनौती दी, तो कहीं खरगोश की चुनौती को स्वीकार भर किया। मगर दोनों ही परिस्थितियों में कछुआ सारे जंगल के सामने खरगोश का घमंड तोड़ने के उद्देश्य से एक असंभव का दावा कर आगे बढ़ा था। सारे जंगल की और मेरी तुम्हारी सहानुभूति कछुए...

ढांचे, दीमक और टूटा हुआ तार...

तुमने मेरा गिटार देखा! एक तार बेतरतीब सा झूल रहा है। अद्वित ने सुर साध रखा था.... "वो ... वो... गिटार... माँ ... गिटार ..." मैंने हार कर दे दिया उसे । वो तारों पर उँगलियाँ फिराता रहा, संगीत के व्याकरण से मुक्त एक धुन सुनाई देती रही ... मुझे भली सी लगी, सो मैंने उसे करने दिया जो भी वो कर रहा था, और ध्यान किताब की ओर वापस खींच लिया। कुछ देर में मेरी किताब छीन कर कहने लगा "टूट गया... टूट गया...", उसकी नन्ही उँगली उसी तार की ओर इशारा कर रही थी...  मेरे चेहरे पे हैरानी मिश्रित उदासी का भाव देखकर वो पूछता रहा, "माँ सैड हो गई?" मैं हंसकर कहती रही, "नहीं, माँ हँस रही है"। मुझे अपनी माँ का उदास चेहरा जादू से अचानक हास्य से लबडब चेहरे में बदल जाता हुआ याद आ गया... ओह! तो यही होता आ रहा है! हाँ यही तो होता आ रहा है! समय में थोड़ा आगे चलूं या थोड़ा पीछे , एक ही ढर्रे पर जीवन खुद को दोहरा रहा है।          मुझसे कुछ पहले, मेरे कुछ बाद, कहीं मुझसे कुछ भाषा-संस्कृति की दूरी पर या मेरे बहुत पास... एक ही सा बीत रहा है, ढाँचे और उनको बनाए रखने की ज़िद... ज़िद में म...

सब ढोंग की भेंट चढ़ गया...

 "तमाम उम्र का हिसाब मांगती है जिंदगी... ये मेरा दिल कहे तो क्या! ये खुद से शर्मसार है।" बीसियों बार सुन डाला इसे, हर बार वही टीस उठती है। जिंदगी से गुजरते हुए कितनी बार ये सोच सकी कि कभी हिसाब भी देना होगा! सपने देखने की उम्र से ही तमाम तरह की जिद पाल ली ब्रह्माण्ड से, और साम दाम दण्ड भेद... हर उपाय लगा लिए उसे पूरा करने को। उस दौड़ में कितने ही सच नकार दिए, कितने ही झूठ ओढ़ लिए।  कभी कुछ बन गई ...कभी कुछ दूसरा और.. कभी तीसरा ही कुछ... हरे कृष्ण, मैने कितने रूप धर लिए, कितने उपक्रम किए, मिट्टी माथे पर धर ली, आसमान जमीन पर फेंक दिया, चांद तारों को पालतू बनाने तक का इरादा कर डाला। कल्पना को जी लेने की धुन ऐसी लगी की सारी जिंदगी खपा दी, जिसने भी जगाने की कोशिश की उसे दूर धकेल दिया, सच का मुंह नोच लिया, आईने सब तोड़ दिए, सूरज पर पर्दा डाल दिया। भीतर जो मैं थी, उसे किसी तरह सर न उठाने दिया, वो मेरी कल्पना की दुनिया के आड़े आती थी,  वो मेरा गुड्डा गुडिया का घरौंदा सजा न रहने देती। वो स्वाभिमान की बात करती थी, सच और झूठ का फर्क बताती थी, में राधाकृष्ण की ओर लपकती, वो ब्रह्म को ...

दो समोसे, इक्कड-दुक्कड, खडिया और सिलेट ...

रात के डेढ़ बजे हैं, मौसम की उमस अब कम है। हवा में शीतलता आ गयी है, बाहर आम का पेड़ अब दोपहर जैसा चिढ़ा हुआ नहीं लग रहा, कुछ शांत है। मैं यहाँ बाहर मनी-प्लांट के पास बैठी हूँ, अद्वित सोया है। घर शांत है। मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है। अब इस वक्त यहाँ बैठे कितनी ही बातें मेरे मन से होकर शून्य में खो जा रही हैं, जो मेरे मन पर कितनी भारी हैं मगर जिनका कोई औचित्य नहीं। मेरी उँगलियों के पोरों में गर्म पानी और डिटर्जेंट से होने वाली जलन, पैरों की उँगलियों में दोपहर की हड़बड़ाहट की कई ठोकरों की टीस रह-रह कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।बोरो-प्लस की ट्यूब में अब ज़्यादा कुछ शेष नहीं है, "कहाँ लगाऊँ" का चुनाव इस वक्त थका देने वाला मालूम होता है, बस ट्यूब हाथ में लिए उसके पीछे की नोक से कलाई सहला रही हूँ जहां कल मधुमक्खी ने काटा था। क्या मैं भी जाकर सो जाऊँ? मगर उठने के साथ ही फिर वही हड़बड़ाहट, जलन, कटना, चुभना, चोटें.... इनका अंत कहाँ है?     मेरी हथेलियाँ अब माँ जैसी लगने लगी हैं।माँ की नानी जैसी।माँ के जीवन पर भी तो वही जलने कटने चुभने और चोटों के निशान हैं।पहले नज़र नहीं आते थे, अब द...