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खरगोश जाना पहचाना सा लगा...

 तुम्हें वो कहानी याद है ! खरगोश और कछुए की कहानी... जिसमें कछुआ दौड़ जीत गया था.. तब कछुए की जीत कैसा रोमांच पैदा करती थी, उसका जज़्बा हिम्मत बांधने वाला था, उसका आत्म-विश्वास मुग्ध करता था... कैसे एक कछुआ खरगोश को दौड़ की चुनौती दे सकता है भला... सोचो तो .. कितना स्वाभिमान, कितना धैर्य.. और आखिरकार जीत। अदभुत !         तुम्हें कभी ऐसा लगा ! कि अगर कहानी में खरगोश जीत जाता तो उस कहानी का क्या बनता ?  मुझे लगा ...       खरगोश का जीतना कहानी नहीं बनती। क्योंकि खरगोश की जीत तो स्वाभाविक थी। एक प्राकृतिक तथ्य। तो फिर कछुए ने किस बूते खरगोश को चुनौती दी होगी ! मेरी दिनचर्या की हड़बड़ाहट को पीछे धकेल इस विचार ने मुझे घेर लिया। मैं ठहर गई। गूगल पर तफरी की तो पाया, इस कहानी के अलग-अलग रूप मजूद हैं। कहीं कछुए ने आगे बढ़कर चुनौती दी, तो कहीं खरगोश की चुनौती को स्वीकार भर किया। मगर दोनों ही परिस्थितियों में कछुआ सारे जंगल के सामने खरगोश का घमंड तोड़ने के उद्देश्य से एक असंभव का दावा कर आगे बढ़ा था। सारे जंगल की और मेरी तुम्हारी सहानुभूति कछुए...

ढांचे, दीमक और टूटा हुआ तार...

तुमने मेरा गिटार देखा! एक तार बेतरतीब सा झूल रहा है। अद्वित ने सुर साध रखा था.... "वो ... वो... गिटार... माँ ... गिटार ..." मैंने हार कर दे दिया उसे । वो तारों पर उँगलियाँ फिराता रहा, संगीत के व्याकरण से मुक्त एक धुन सुनाई देती रही ... मुझे भली सी लगी, सो मैंने उसे करने दिया जो भी वो कर रहा था, और ध्यान किताब की ओर वापस खींच लिया। कुछ देर में मेरी किताब छीन कर कहने लगा "टूट गया... टूट गया...", उसकी नन्ही उँगली उसी तार की ओर इशारा कर रही थी...  मेरे चेहरे पे हैरानी मिश्रित उदासी का भाव देखकर वो पूछता रहा, "माँ सैड हो गई?" मैं हंसकर कहती रही, "नहीं, माँ हँस रही है"। मुझे अपनी माँ का उदास चेहरा जादू से अचानक हास्य से लबडब चेहरे में बदल जाता हुआ याद आ गया... ओह! तो यही होता आ रहा है! हाँ यही तो होता आ रहा है! समय में थोड़ा आगे चलूं या थोड़ा पीछे , एक ही ढर्रे पर जीवन खुद को दोहरा रहा है।          मुझसे कुछ पहले, मेरे कुछ बाद, कहीं मुझसे कुछ भाषा-संस्कृति की दूरी पर या मेरे बहुत पास... एक ही सा बीत रहा है, ढाँचे और उनको बनाए रखने की ज़िद... ज़िद में म...

सब ढोंग की भेंट चढ़ गया...

 "तमाम उम्र का हिसाब मांगती है जिंदगी... ये मेरा दिल कहे तो क्या! ये खुद से शर्मसार है।" बीसियों बार सुन डाला इसे, हर बार वही टीस उठती है। जिंदगी से गुजरते हुए कितनी बार ये सोच सकी कि कभी हिसाब भी देना होगा! सपने देखने की उम्र से ही तमाम तरह की जिद पाल ली ब्रह्माण्ड से, और साम दाम दण्ड भेद... हर उपाय लगा लिए उसे पूरा करने को। उस दौड़ में कितने ही सच नकार दिए, कितने ही झूठ ओढ़ लिए।  कभी कुछ बन गई ...कभी कुछ दूसरा और.. कभी तीसरा ही कुछ... हरे कृष्ण, मैने कितने रूप धर लिए, कितने उपक्रम किए, मिट्टी माथे पर धर ली, आसमान जमीन पर फेंक दिया, चांद तारों को पालतू बनाने तक का इरादा कर डाला। कल्पना को जी लेने की धुन ऐसी लगी की सारी जिंदगी खपा दी, जिसने भी जगाने की कोशिश की उसे दूर धकेल दिया, सच का मुंह नोच लिया, आईने सब तोड़ दिए, सूरज पर पर्दा डाल दिया। भीतर जो मैं थी, उसे किसी तरह सर न उठाने दिया, वो मेरी कल्पना की दुनिया के आड़े आती थी,  वो मेरा गुड्डा गुडिया का घरौंदा सजा न रहने देती। वो स्वाभिमान की बात करती थी, सच और झूठ का फर्क बताती थी, में राधाकृष्ण की ओर लपकती, वो ब्रह्म को ...

दो समोसे, इक्कड-दुक्कड, खडिया और सिलेट ...

रात के डेढ़ बजे हैं, मौसम की उमस अब कम है। हवा में शीतलता आ गयी है, बाहर आम का पेड़ अब दोपहर जैसा चिढ़ा हुआ नहीं लग रहा, कुछ शांत है। मैं यहाँ बाहर मनी-प्लांट के पास बैठी हूँ, अद्वित सोया है। घर शांत है। मुझे यहाँ अच्छा लग रहा है। अब इस वक्त यहाँ बैठे कितनी ही बातें मेरे मन से होकर शून्य में खो जा रही हैं, जो मेरे मन पर कितनी भारी हैं मगर जिनका कोई औचित्य नहीं। मेरी उँगलियों के पोरों में गर्म पानी और डिटर्जेंट से होने वाली जलन, पैरों की उँगलियों में दोपहर की हड़बड़ाहट की कई ठोकरों की टीस रह-रह कर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है।बोरो-प्लस की ट्यूब में अब ज़्यादा कुछ शेष नहीं है, "कहाँ लगाऊँ" का चुनाव इस वक्त थका देने वाला मालूम होता है, बस ट्यूब हाथ में लिए उसके पीछे की नोक से कलाई सहला रही हूँ जहां कल मधुमक्खी ने काटा था। क्या मैं भी जाकर सो जाऊँ? मगर उठने के साथ ही फिर वही हड़बड़ाहट, जलन, कटना, चुभना, चोटें.... इनका अंत कहाँ है?     मेरी हथेलियाँ अब माँ जैसी लगने लगी हैं।माँ की नानी जैसी।माँ के जीवन पर भी तो वही जलने कटने चुभने और चोटों के निशान हैं।पहले नज़र नहीं आते थे, अब द...

मुझे अब "स्त्री " बने रहना स्वीकार नहीं

सब बातें कही नहीं जातीं... कुछ बातें छुपी होती हैं... प्रकट,  मगर सुन्दर शब्दों के बीच छुपी हुई। जैसे यह कि बेटियां सन्तान होने का अधिकार नहीं रखतीं।  क्योंकि वो स्त्री  हैं,  उनसे अपेक्षित नहीं है कि वे अपने अभिभावकों के प्रति उत्तरदायित्व का अनुभव करें... अपने सहोदर भाई  बहनों के प्रति स्नेह वस्तुतः एक विकृति है। विवाह के परिणामस्वरूप उन्हें नए अभिभावक दिए जाते हैं... जिनके प्रति रातोंरात चामत्कारिक रूप से उन्हें अपनी 25-30 वर्षों  की भावना स्थानांतरित कर देनी होगी ... ऐसा कर सकने में असमर्थ स्त्रियां तिरस्कार की दृष्टि से देखी जाती हैं।   क्योंकि वे बेटियाँ हैं  ... वे संतान होने का अधिकार नहीं रखतीं। ज़ाहिर है, बेटों के साथ ऐसी बाध्यता नहीं है। उन्हें विवाह के मूल्य स्वरूप अभिभावक नहीं बदलने होते। मैं सुनी सुनाई बात नहीं कर रही... ये तो सब जानते हैं...समाज में स्वीकृत भी है.. पति की कामना में सदियों से स्त्रियां माताएँ बदलती आई हैं.. उसी समाज में.."यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते..." ।  मगर इस बात को कहना नहीं होता... इससे स्त्रियों का देवत...

घोड़ा छनक्क से टूट गया...

तुमसे कहा नहीं कुछ काफ़ी वक्त से।जब ज़्यादा कुछ घट जाता है , कहते नहीं   बनता कुछ...    तुमसे सुनते भी तो नहीं बनता । मैं एक यात्रा पर थी। बड़ी विचित्र यात्रा। कल्पना के घोड़े पर सवार मैं निकली तो थी की सब पा लूँगी , पा भी लिया , लेकिन पहुँची कहीं नहीं। रास्ते में हुआ ये कि   घोड़ा छनक्क से टूट गया।मैं गिर पड़ती , मगर कुछ ठोस था ही नहीं   जहां से गिरती , जहां पर गिरती। ये “ न - गिरना ” बड़ा कठिन रहा , यह “ कहीं - नहीं से कहीं - नहीं ” की यात्रा बड़ी लम्बी और थकान भारी रही। अब जो महसूस हो रहा है , मैं नहीं   जानती वो क्या है। अब सोच रही हूँ क्या ये यात्रा ज़रूरी थी ? हाँ , थी तो। वरना इस “ कुछ - नहीं ” का बोध कैसे होता !  यही कहानी , जिसमें कुछ भी नहीं हुआ , यही तो सुना रही थी उस रोज़ अद्वित  को। हँसता रहा वो।हँसना ही तो वाजिब है ऐसी कहानियों पर। तुम क्यों संजीदा हुए जाते हो ? ज़िंदगी ! ज़िंदगी की बात कर रही हू...

व्यक्ति को परिभाषाओं में बांधना छोड़ दो !

"वामपंथी" !! ...क्योकि मैं पूजा नहीं करती ? क्योकि मैं तुम्हारी भीड़ से उलट चलती हूँ ?... .             नहीं पागल !  किसी भी धर्म, संस्था या सिद्धांत से ज्यादा मुझे वो वस्तुएं प्रिय हैं जिनसे घिरे हुए मेरा वक्त बीतता है। संभव है तुम्हें मेरी बात ठीक न लगे, छिछली लगे ! लेकिन वस्तुओं में मैंने वो गर्माहट ढूंढी है, जो अमूमन रिश्तों में पाई जाती है!  बहुत लंबा वक्त अकेले बिताया है, और उस लंबे वक़्त में वस्तुओं ने मुझे संभाला है, सहारा दिया है, हंसाया है, धीरज बंधाया है... तुम नहीं थे !! मेरा तकिया था .. जिसे गले लगा कर मैं घंटो रोई हूं... जिसके सीने में चेहरा छुपाए सिसकियां थमने से पहले ही सो गई थी.. मेरा लैपटॉप था, उदास होने पर जिसकी और हाथ बढ़ाया है.. और वो मुझे घंटो फुसलाता रहा.. मेरा एक्रेलिक रंगों का डब्बा मुझे पुकार कर अपने पास बिठा लेता है जब अनमनी सी कुछ सोच रही होती हूं.. मेरा नीला सोनी स्पीकर मुझे अकेलापन महसूस नहीं होने देता... शम्मी कपूर के गानों पर अकेले नाचते झूमते जब थक जाती हूं.. फिर अपने तकिए कि गोद में चली जाती हूं, दीवार पर औ...