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घोड़ा छनक्क से टूट गया...

तुमसे कहा नहीं कुछ काफ़ी वक्त से।जब ज़्यादा कुछ घट जाता है , कहते नहीं   बनता कुछ...    तुमसे सुनते भी तो नहीं बनता । मैं एक यात्रा पर थी। बड़ी विचित्र यात्रा। कल्पना के घोड़े पर सवार मैं निकली तो थी की सब पा लूँगी , पा भी लिया , लेकिन पहुँची कहीं नहीं। रास्ते में हुआ ये कि   घोड़ा छनक्क से टूट गया।मैं गिर पड़ती , मगर कुछ ठोस था ही नहीं   जहां से गिरती , जहां पर गिरती। ये “ न - गिरना ” बड़ा कठिन रहा , यह “ कहीं - नहीं से कहीं - नहीं ” की यात्रा बड़ी लम्बी और थकान भारी रही। अब जो महसूस हो रहा है , मैं नहीं   जानती वो क्या है। अब सोच रही हूँ क्या ये यात्रा ज़रूरी थी ? हाँ , थी तो। वरना इस “ कुछ - नहीं ” का बोध कैसे होता !  यही कहानी , जिसमें कुछ भी नहीं हुआ , यही तो सुना रही थी उस रोज़ अद्वित  को। हँसता रहा वो।हँसना ही तो वाजिब है ऐसी कहानियों पर। तुम क्यों संजीदा हुए जाते हो ? ज़िंदगी ! ज़िंदगी की बात कर रही हू...

व्यक्ति को परिभाषाओं में बांधना छोड़ दो !

"वामपंथी" !! ...क्योकि मैं पूजा नहीं करती ? क्योकि मैं तुम्हारी भीड़ से उलट चलती हूँ ?... .             नहीं पागल !  किसी भी धर्म, संस्था या सिद्धांत से ज्यादा मुझे वो वस्तुएं प्रिय हैं जिनसे घिरे हुए मेरा वक्त बीतता है। संभव है तुम्हें मेरी बात ठीक न लगे, छिछली लगे ! लेकिन वस्तुओं में मैंने वो गर्माहट ढूंढी है, जो अमूमन रिश्तों में पाई जाती है!  बहुत लंबा वक्त अकेले बिताया है, और उस लंबे वक़्त में वस्तुओं ने मुझे संभाला है, सहारा दिया है, हंसाया है, धीरज बंधाया है... तुम नहीं थे !! मेरा तकिया था .. जिसे गले लगा कर मैं घंटो रोई हूं... जिसके सीने में चेहरा छुपाए सिसकियां थमने से पहले ही सो गई थी.. मेरा लैपटॉप था, उदास होने पर जिसकी और हाथ बढ़ाया है.. और वो मुझे घंटो फुसलाता रहा.. मेरा एक्रेलिक रंगों का डब्बा मुझे पुकार कर अपने पास बिठा लेता है जब अनमनी सी कुछ सोच रही होती हूं.. मेरा नीला सोनी स्पीकर मुझे अकेलापन महसूस नहीं होने देता... शम्मी कपूर के गानों पर अकेले नाचते झूमते जब थक जाती हूं.. फिर अपने तकिए कि गोद में चली जाती हूं, दीवार पर औ...

दौड़ी ... फिसली .. धप्प्प... ! बारिश !!

डुबुक्क ! गया पैर पानी में। ऐसा वैसा पानी नहीं, सीवर के पानी में उतरा हुआ बारिश का पानी, जो अपनी औकात भूल कर फैलते फैलते पूरे मोहल्ले को ढक चुका था। वैसे ही जैसे ढक लेती हैं चींटियां हर रोशनी की संभावना पर लगते ही। बारिश सबको कुछ फुला देती है, मेरी किताब की पन्ने हो या मेरा मन। फिर भी  हर छीछालेदर के बावजूद मुझे बुरी नहीं लगती बारिश।        मैं पैर डुबकाती जहां गई, वहां काम बना नहीं, बारिश ! घर आई तो सारी रात बिना बिजली, पानी के मेरे साथ ऊंघा हुआ घर मुझे घूरता रहा। जुगाड़े हुए पानी की मैगी पर दिन तो कटा लेकिन शाम पेट पर भारी रही। भरी दोपहरी में मुंह अंधेरा किए कमरे से ऊब कर दरवाजे के सामने ज़मीन पर अखबार फैलाए जो बाहर देखती रही थी, सो शाम तक देखती ही रही। बस पानी की टपर- टपर हरे पत्तों पर। बीच बीच में सीलन के मारे फूल के कुप्पा हुई किताब के पन्ने सहलाए। पढ़ने का ढोंग भी कर लिया, सेल्फी में खुद को तुलना मधुबाला से कर डाली, तुम्हें याद भी किया, तुम्हें भूल भी गई। लेकिन सारी रूमानियत की बखिया उधेड़ी पेट की मरोड़ और ऐंठन ने।         ...

मैं एक विरोधाभास का पीछा कर रही हूँ, तुम भी एक कल्पना को गले लगाए हो !

           तुम्हारे साथ कभी ऐसा हुआ है कि एक साथ कई तरह की बातें दिमाग से तेज़ी से होकर गुज़र जाएं और तुम उनकी रफ़्तार का पीछा ही न कर सको ! हफ्तों पुरानी चादर पर आलस में लिपटा धप्प से पड़ा हुआ मेरा शरीर मेरे दिमाग से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा है। बाहर बारिश हो रही है। बारिश से धुले घाट की महक मेरे अंतर में भरी जा रही है , चलूं घाट की तरफ... उफ्फ... तबियत भी तो साथ नहीं देती ! मैं फिर किताब में आंखें धंसा लेती हूं , डैग्नी टैग्गार्ट* अपनी मानसिक क्षमता के समकक्ष किसी मित्र/शत्रु की अनुपलब्धता की खीझ से उठकर बाहर निकली है, वो किस ओर जाएगी ? मैं पढ़ती जा रही हूं, जैसे पढ़ते जाने से मुझे मेरी खीझ का समाधान मिल जाएगा।  जैसे मेरी, डैग्नी टैग्गार्ट की और सभी तरक्की पसंद औरतों की खीझ एक ही है ! जैसे आत्म-उन्नति की इच्छा को अपराध-बोध से सान दिया जाना किसी देश-काल में सीमित नहीं है , "तुम स्वार्थी हो !" का लांछन 'सार्वभौमिक उद्घोषणा है और हर सफल स्त्री इससे गुज़र कर ही आगे बढ़ी है।  मैं पढ़ती जा रही हूं ... रेडियो पर गाने की लाइन ने ध्यान खींच लिया है .....

मुझे सरलता आकर्षित करती है.... जंगल की रौद्र भयावह सरलता !

मेरे पास एक गिटार है।  कभी - कभी मैं उसे अपने बगल में रख के सोती हूं। मुझे बजाना नहीं आता।  सीखना शुरू किया था , फिर अधूरा छोड़ दिया। अब भी कभी -कभी यू-टयूब पर कॉर्ड्स बजाने के तरीके ढूंढ लिया करती हूं , उंगलियां  निर्धारित ढंग से खूब जमा कर 2-3  मिनट वक़्त जाया करती हूं , फिर तारों को अपने ही बेतुके ढंग में टुनटुनाने लगती हूं। घंटो बीत जाते हैं बिना नाम, बिना सुर की बेढंगी धुन बजाते , सुनते।  अच्छा लगता है। मन का सारा शोर जैसे संगीत में बदल जाता है।  बेतुका संगीत ! जैसा जीवन है।                सुर, लय  और ताल में गुंथा हुआ संगीत पैदा करने के लिये साधना की ज़रूरत है, अनुशाषन , नियमबद्ध आचरण की ज़रूरत है। मेरे बस का कहाँ !! तुम तो जानते हो ! मुझे सरलता आकर्षित करती है.... जंगल की सरलता ! रौद्र सरलता ! वो सरलता जो भयावह होती है। प्रकृति सुलभ सरलता। वो सरलता जो सीमेंट की ढ़हनापेक्षी दीवार से उग आई पीपल की अनअपेक्षित पौध में है, वो सरलता जो तमाम पूर्वनिर्धारित योजनओं की सूची की ओर भागते हुए अचानक टकरा जाने वा...

'हैरी पॉटर ' वाली नोटबुक का 'बुद्धिजीविता ' से कोई आवश्यक विरोध नहीं है

       तुम्हें याद है ? ये कविता पढ़ी थी हमने बचपन में, 'भारत भूषण अग्रवाल' की, "मैं और मेरा पिट्ठू ", और मैंने तभी कहा था तुमसे , ये पिट्ठू बड़ा परेशान  करेगा मुझे ! तुम समझे ही नहीं थे, तुम्हें लगा था मैं समय के साथ एक निश्चित ठोस व्यक्तित्व में विकसित  हो जाउंगी। बोलो हुआ क्या वैसा ? बताओ अब क्या करूँ !       'स्प्लिट पर्सनालिटी ' ?  मुझे नहीं लगता।  मुझे लगता है ऐसा स्वीकार कर लेना सरलीकरण होगा ! मुझे लगता है जब व्यक्ति जटिलताओं में सामंजस्य बिठाने के क्रम में उस स्तर  को प्राप्त कर लेता है जिसे तुम "मैच्योरिटी " कहते हो, तब एकाएक अगर बहुत सरल  सी कोई भावना उससे टकरा जाए तो वो अचकचा जाता है ! समझ नहीं पाता उसे।  भौंचक रह जाता है। शायद क्योंकि एक उम्र के बाद आम के पेड़ों पर लड्डू नहीं फल सकते , सिक्के बो कर पौधे निकलने का इंतज़ार नहीं होता और न ही बादलों से एक बुढ़िया हाथ में हथौड़ी लिए नीचे झांकती है। एक उम्र के बाद टॉम और जेरी में किसी प्रकार की मित्रता  की सम्भावना नहीं रह ज...

जहाँ ये जा रहे हैं न ! वहां अब कोई भगवान् नहीं रहता !

एक राजकुमार था, बहुत सुन्दर ! थोड़ा खोया खोया सा रहता था।  उसे कई सारी बातें समझ में नहीं आती थी।  जैसे लोग खुश क्यों नहीं रह पाते ? जैसे झुर्रियों वाला बुढ़ापा सबकी नियति क्यों है ? जो मिलता है वो खो क्यों जाता है ? चोट क्यों लगती है ? दर्द क्यों होता है ? लोग मूर्तियों के आगे कीर्तन करते हैं, फूल चढ़ाते हैं , कभी - कभी किसी स्वस्थ जानवर की बलि भी चढ़ा डालते हैं ! उन्हें लगता है इससे दुःख दूर हो जाएगा , लेकिन घर पहुंचते पहुंचते ही कोई नया दुःख फिर उन्हें घेर लेता है। उसने सोचा वो इसका हल ढूढ़ेगा ! ये मूर्तियां , मंदिर, कीर्तन , क्या बचकानी बातें हैं !  वो ठोस समाधान चाहता था ! उस समाधान की खोज में निकल गया।  लोग कहते हैं सफल भी हुआ था ! लोगों के पास लौट कर आया भी, कि इनको भी बता दूं , इनका भी दुःख दूर हो जाए !            पता नहीं उसने क्या कहा , पता नहीं लोगों ने क्या सुना ! लेकिन भीड़ इकट्ठी ज़रूर हुई ! भीड़ ने उसकी मूर्तियां बना डालीं , मंदिर गढ़ लिए, कीर्तन करने लगी उसी के आगे , प्रसाद बांटें ! उसे जानवरों का मार...